आखिर क्या होता है ‘एक्ट ऑफ गॉड’ और कब, कैसे लागू होता है?

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कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया भर में अर्थव्यवस्थाओं पर बुरा असर पड़ा है. हाल में, भारत में जीडीपी के जो आंकड़े जारी हुए, उनके मुताबिक भारत की जीडीपी -24% के करीब तक लुढ़क गई, जो दुनिया में सबसे बुरी तरह प्रभावित अर्थव्यवस्था साबित हुई. इस बीच देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था पर पड़े इस असर की तुलना ‘एक्ट ऑफ गॉड’ से की. इसके बाद से यह बहस का मुद्दा बना हुआ है.

एक तरफ, पी चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता सीतारमण के बयान पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो दूसरी तरफ, यह विश्लेषण भी हो रहा है कि अन्य देश अर्थव्यवस्था पर कोविड 19 के असर को किस तरह से डील कर रहे हैं. इस बीच सबसे ज़रूरी बात यही है कि कानूनी तौर पर एक्ट ऑफ गॉड क्या है?

वैधानिक तौर पर इसे फोर्स मैज्योर क्लॉज़ (FMC) के तौर पर समझा जाता है. यह इस ​तरह की स्थिति होती है, जिसमें दोनों तरफ की पार्टियां दायित्व मुक्त हो जाती हैं क्योंकि यह स्थिति वश में नहीं होती. यह फ्रेंच टर्म है, जिसे एक्ट ऑफ गॉड के कॉंसेप्ट के तौर पर समझा जाता है. इसमें प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही युद्ध जैसी आपातकाल परिस्थितियां शामिल मानी जाती हैं. यह क्लॉज़ ज़्यादातर कमर्शियल अनुबंधों में होता है और संकट की स्थितियों के लिए इसे रखा जाता है. इस क्लॉज़ के लागू होते ही अनुबंध करने वाली दोनों पार्टियां अनुबंध पर आश्रित नहीं रहतीं, यानी दायित्वों से मुक्त हो जाती हैं. जैसे इंश्योरेंस कंपनी अगर किसी को इंश्योरेंस दे रही है, तो वह संकट के चलते यानी इस क्लॉज़ के लागू होते ही इंश्योरेंस की रकम देने से इनकार कर सकती है.

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इस क्लॉज़ के लागू होने पर दायित्व से मुक्त होने को अनुबंध या करार तोड़ना नहीं माना जाता. आम तौर से एक्ट ऑफ गॉड के तहत उन प्राकृतिक आपदाओं को समझा जाता है, जिनके बारे में पूर्वानुमान नहीं हो लेकिन इस एक्ट के तहत वो संकट भी शामिल हैं, जो मानवीय हस्तक्षेप के कारण घटित हो सकते हैं. प्राकृतिक आपदाएं युद्ध, दंगों के अलावा हड़ताल तक भी इस क्लॉज़ में शामिल की जा सकती है.

सरकारी स्तर पर इस एक्ट के लिए जो नई नीति है, उसमें व्यापारिक प्रतिबंधों, बॉयकॉट और महामारी जैसी स्थितियों को भी सूचीबद्ध किया गया है. हालांकि इस क्लॉज़ को लागू करने के संबंध में संबंधित पार्टियों के बीच बातचीत की गुंजाइश रहती है. एकतरफा हिसाब से इसे लागू करने की प्रैक्टिस नहीं रही है. इस क्लॉज़ के अलावा, इंडियन कॉट्रैक्ट एक्ट 1872 भी इस तरह का प्रावधान देता है