बिहार की राजनीति में चिराग पासवान ने भड़काई बदलाव की चिंगारी

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बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में जनादेश आ चुका है. 125 सीटें जीतकर एनडीए ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. चौथी बार नीतीश कुमार के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सजने जा रहा है. विचित्र लाभ और संपार्श्विक क्षति का कानून जीवन के लिए जितना लागू होता है, उतना ही राजनीति में भी.

उदाहरण के लिए अन्ना हजारे के पास भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का नेतृत्व करने के लिए सही गैर-राजनीतिक साख थी. आंदोलन ने कई सरकारों को ध्वस्त कर दिया. हजारे के मराठवाड़ा गांव में बसने से पहले, जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत बंद और जनआंदोलन को बीजेपी ने बखूबी इस्तेमाल किया. बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-आंदोलन को कांग्रेस के लिए व्यापक रूप से ट्रंप कार्ड के तौर पर इस्तेमाल किया. अरविंद केजरीवाल ने फिर शीला दीक्षित को पछाड़ दिया. किरण बेदी दिल्ली में बीजेपी की उम्मीदवार बनीं. बाद में वह लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में पुदुचेरी में तैनात हो गईं.

दूसरे उदाहरण के तौर पर झारखंड को देखते हैं. झारखंड में पिछले साल विधानसभा चुनाव के लिए सरयू राय अपना टिकट पाने के लिए दिल्ली नेतृत्व की हां के इंतजार में रहे. नेतृत्व से कोई आश्वासन नहीं मिलने के कारण उन्होंने जमशेदपुर से सीएम रघुबर दास को चुनौती दी. राय यहां से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत गए. इसका खामियाजा बीजेपी को उठाना पड़ा. अब झारखंड में कांग्रेस के गठजोड़ के साथ हेमंत शोरेन की सरकार है.

अब बात बिहार चुनाव की. एलजेपी चीफ चिराग पासवान ने यहां नीतीश कुमार के खिलाफ सरयू राय का काम किया. बिहार विधानसभा चुनाव में एलजेपी भले ही शहीद हो गई, मगर पार्टी ने बीजेपी की गठबंधन में बड़ा भाई बनने की मुराद पूरी कर दी. एलजेपी ने एक तरफ जहां एंटी इनकंबैंसी वोटों को विपक्षी महागठबंधन में जाने से रोका, वहीं दो दर्जन से अधिक सीटों पर जदयू को सीधा नुकसान पहुंचाया. हालांकि, इस पूरे खेल में एलजेपी को खुद अपने हाथ कुछ नहीं लगा. उसे सिर्फ एक सीट पर जीत हासिल हुई. अब एनडीए के साथ एलजेपी रहेगी या नहीं, ये केंद्र सरकार की जल्द होने वाली कैबिनेट फेरबदल में तय हो जाएगा.

पूरे चुनाव में एलजेपी ने बीजेपी को कम, लेकिन जेडीयू को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. पार्टी ने जेडीयू की सीटों पर उम्मीदवार उतारे. इसी दौरान बड़ी संख्या में बीजेपी के बागी नेता एलजेपी के टिकट पर मैदान में उतरे. तब यह भी चर्चा थी कि बीजेपी ने एंटी इनकंबैंसी वोटों को विपक्षी खेमे में जाने से रोकने के लिए यह रणनीति बनाई है.

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नतीजे बताते हैं कि बीजेपी की यह रणनीति चुनाव मैदान में काम आई. बीजेपी 76 सीटें हासिल कर गठबंधन में बड़ा भाई की भूमिका हासिल करने में कामयाब रही. डीयू न सिर्फ एनडीए में छोटे भाई की भूमिका में आ गई, बल्कि बिहार में बीजेपी और आरजेडी के बाद तीसरे नंबर की पार्टी बन गई.

वास्तव में, पूरे चुनावी अभियान में चिराग पासवान की ज्यादा दिलचस्पी महागठबंधन के सीएम चेहरे तेजस्वी यादव पर हमला बोलने से ज्यादा नीतीश कुमार पर व्यक्तिगत कमेंट करने में रही. वहीं, बीजेपी ने सीएम के रूप में नीतीश कुमार के रिकॉर्ड का बचाव किया. पार्टी ने कहा कि अगर वह भगवा पार्टी की तुलना में कम सीटें हासिल करते हैं, तो भी जदयू प्रमुख नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे. अब देखना है कि क्या बिहार चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी अपनी बात पर कायम रहती है या कुछ और फैसले लेगी.

बहरहाल, चिराग पासवान ने सचेत रूप से या असचेत रूप से ये साबित किया है कि वह राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर सकते हैं. इस चुनाव में उन्होंने नीतीश कुमार को बीजेपी का छोटा साझीदार बना दिया है. आने वाले दिनों में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में इसका एक व्यापक प्रभाव होगा.

नतीजे के बाद असली सवाल चिराग के भविष्य को ले कर है. चिराग अपने पिता की जगह केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना चाहते हैं. इसके अलावा वह अपनी मां को दिवंगत पिता की जगह राज्यसभा भेजना चाहते हैं. इस समय जेडीयू एलजेपी से बेहद खफा है. इसलिए सवाल उठता है कि क्या बीजेपी जेडीयू को नाराज कर चिराग को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देगी?