भारत-चीन तनाव : क्यों याद किए जाने चाहिए नेहरू के वो एक लाख शब्द?

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चीन के साथ सीमा पर तनाव की खबरों के सिलसिले के बीच यह भी चर्चा रही कि चीन के मुद्दे पर लोकसभा में पर्याप्त चर्चा क्यों नहीं हो सकी? इस बीच, पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 131वीं जयंती के मौके पर दो प्रमुख पत्रकारों के लेखों ने इस चर्चा में काफी कुछ समझने के मौके दिए. एक तो ये कि 1962 में भारत और चीन के बीच जो युद्ध हुआ, उसके बारे में तत्कालीन संसद में क्या माहौल रहा और नेहरू ने किस तरह सवालों के जवाब दिए और दूसरे यह कि इस समय नीतियों के स्तर पर नेहरू सरकार क्यों प्रासंगिक है.

खासकर चीन के संदर्भ में, नेहरू की नीतियों को लेकर कई तरह की किताबें लिखी जा चुकी हैं और कई तरह से उनकी आलोचना भी हो चुकी है. इसके बावजूद, चीन को लेकर देश के भीतर बहस से नेहरू ने कभी इनकार नहीं किया. वरिष्ठ पत्रकार पी रमन के एक लेख के मुताबिक जानते हैं कि कैसे संसदीय रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि नेहरू के समय में किस तरह चीन मुद्दे पर ​बहस के लिए द्वार खुले हुए थे.

नेहरू के वो 1 लाख से ज़्यादा शब्द
संसदीय रिकॉर्ड बताते हैं कि 16 अगस्त 1961 से 12 दिसंबर 1962 के बीच नेहरू ने चीन मसले पर 32 बयान और संसद में टिप्पणियां जारी की थीं. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर नेहरू ने 1.04 लाख से ज़्यादा शब्द कहे थे, यानी कम से कम 200 छपे हुए पन्नों के बराबर कंटेंट. रमन के मुताबिक नेहरू ने संसद में चीन को लेकर कार्यवाही में रुकावट नहीं आने दी और न ही विपक्ष को सवाल पूछने से रोका.
यह फैक्ट भी ध्यान देने लायक है कि 1962 के चुनाव के बाद तीसरी लोकसभा में नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस के पास कुल 494 लोकसभा सीटों में से 361 सीटों का भारी बहुमत था. गौरतलब है कि नेहरू ने विदेश और रक्षा मंत्रालय काफी समय तक अपने पास ही रखे थे इसलिए उन्होंने चीन मुद्दे से जुड़े तमाम सवालों के जवाब भी खुद ही दिए थे.

विपक्ष ने चीन के साथ संघर्ष को लेकर काफी आलोचनाएं की थीं और करीब 165 सदस्यों ने लोकसभा में बहस में इस मुद्दे पर विचार रखे थे. विपक्ष के आरोपों के बीच नेहरू ने बार बार यही भरोसा दिलाया था कि वो संसद के सामने चीन मुद्दे से जुड़े तमाम कागज़ प्रस्तुत करेंगे. हेम बरुआ, नाथ पाई, अटल बिहारी वाजपेयी, एनजी रंगा, बलराज मधोक, आचार्य कृपलानी, फ्रैंक एंथनी, एमपी सिंह, ब्रजराज सिंह और महावीर त्यागी जैसे दिग्गज विपक्ष के सामने नेहरू ने लोकतंत्र को जीवित रखते हुए हर बहस में शामिल रहकर सवालों का सामना किया था.

मैं अमल की आज़ादी का कायल हूं. ये मेरा कौल है कि अव्वल तो इस सदन को सूचित किए बगैर कोई फैसला नहीं होगा और ये भी कि भारत के सम्मान को कलंकित करने वाला कोई कदम नहीं उठाया जाएगा. इसके बाद, मैं फैसले की आज़ादी चाहता हूं.

— लोकसभा में 14 अगस्त 1962 को नेहरू का कथन

क्या नेहरू की गलतियां फिर हुईं?
लद्दाख में चीन के साथ मौजूदा तनाव की स्थिति को गौर से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि नेहरू ने अपने समय में चीन पर भरोसा करके जो गलती की थी, वही भारत ने मोदी सरकार के समय में भी की. वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता के लेख के मुताबिक 2014 में जब पूर्ण बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला, तब से ही उनकी सरकार ने विश्वास रखा कि अब चीन के साथ कभी युद्ध नहीं होगा और यही भरोसा महंगा पड़ा.

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माना गया कि जब आप एक ग्लोबल सिस्टम के हिस्से बन जाते हैं और आर्थिक तौर पर एक दूसरे पर निर्भर होते हैं तो इन स्थितियों में युद्ध की संभावनाएं न के बराबर हो जाती हैं. मोदी सरकार की इसी धारणा को गुप्ता ने बारीकी से समझाते हुए अपने लेख में लिखा कि चीन पर भरोसा करते हुए रक्षा क्षेत्र, खासकर चीनी सीमाओं पर सुरक्षा की ओर बजट और ध्यान कम रखा गया,​ जिसका खमियाज़ा फिर भारत ने भुगता.

गौरतलब है कि 5 दिसंबर 1961 को लोकसभा बहस में स्वतंत्र पार्टी ने कहा था कि चीन से खतरे के मद्देनज़र पंचवर्षीय योजना को रद्द करते हुए तमाम संसाधन बॉर्डर पर इस्तेमाल किए जाने चाहिए. तब नेहरू ने कहा था ‘अगर हम पंचवर्षीय योजना रद्द करते हैं, तो यह भारत को चीन के सामने आत्मसमर्पण कर देने जैसा होगा.’

रमन के मुताबिक नेहरू की यह बात 53 साल बाद सच साबित हुई, जब मोदी सरकार ने पंचवर्षीय योजना को खत्म किया और जीडीपी, उत्पादन और निर्यात के पतन का सिलसिला साफ देखा गया. इसके साथ ही, रमन ने यह भी लिखा कि कैसे इस साल चीन मुद्दे पर बहस की विपक्ष की मांग को सरकार ने खारिज कर दिया और संसद में इस विषय पर बातचीत ही नहीं हो सकी.