जानिए कौन है वो इंजीनियर, जिसने गीले कपड़ों से बना दी बिजली

0
15

बचपन में स्कूली किताबों में पढ़ा या किसी बड़े से सुना होगा कि गीले कपड़े पहनकर बिजली का काम नहीं करना चाहिए क्योंकि करंट लग सकता है. गीले कपड़े बिजली के बेहतर सुचालक होते हैं, इस बात को हिदायत नहीं बल्कि थ्योरी के तौर पर समझकर त्रिपुरा के एक इंजीनियर ने नया कारनामा कर दिया. गीले कपड़े की मदद से इतनी बिजली पैदा कर दी, जिससे न केवल मोबाइल फोन के चार्जर बल्कि कुछ मेडिकल उपकरण भी चल सकते हैं. इस प्रयोग को राष्ट्रीय स्तर पर वाहवाही मिली है.

शंख शुभ्र दास को केंद्र सरकार ने इस महीने गांधीवादी युवा तकनीकी इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया. कपड़े से बिजली पैदा करने के इस इनोवेशन के लिए दास के बारे में आपको बताते हैं और यह भी बताते हैं कि किस तरह यह आइडिया आईआईटी से शुरू हुआ था.

दास और उनका इनोवेशन

त्रिपुरा के सिपाहीजाल ज़िले में बांग्लादेश बॉर्डर पर एक छोटे से गांव खेड़ाबारी से ताल्लुक रखने वाले दास ने अपने इस इनोवेशन के लिए कैपिलरी एक्शन और पानी के वाष्पीकरण सिद्धांत को आधार बनाया. दास ने इस प्रयोग के लिए एक कपड़े को एक खास ढंग से काटा, जिसे प्लास्टिक के स्ट्रॉ के भीतर डाला जा सकता था. इसके बाद एक कंटेनर में पानी भरकर स्ट्रॉ का दूसरा सिरा डाला गया.

इसके साथ ही, तांबे के इलेक्ट्रोडों को स्ट्रॉ के दोनों सिरों से जोड़ा ताकि वोल्टेज मिल सके. कैपिलरी एक्शन के चलते इस प्रयोग से 700 मिली वोल्ट पैदा होना दर्ज किया गया. हालांकि इतनी बिजली से इलेक्ट्रिकल उपकरणों को चार्ज करना संभव नहीं था इसलिए दास और उनकी टीम ने इस प्रयोग में करीब 30 से 40 और उपकरणों को जोड़कर बिजली पैदा करने की ठानी.

इस प्रयोग के बाद करीब 12 वोल्ट बिजली पैदा हो सकी, जिससे मोबाइल फोन के चार्जर के साथ ही एक छोटा एलईडी बल्ब और हीमोग्लोबिन व ग्लूकोज़ टेस्टिंग किट आदि को चार्ज किया जा सकता था.

READ More...  आधे भारत में आंधी-तूफान के साथ भारी बारिश का अलर्ट,बंगाल की खाड़ी में हलचल

यह एक फंड प्रोजेक्ट है

जी हां, केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन के हाथों सम्मानित किए गए दास ने बताया कि यह एक फंडेड रिसर्च प्रोजेक्ट था, जिसका मकसद दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में बिजली पैदा करने वाले डिवाइसों की संभावना तलाशना था. ऐसे डिवाइस जो हल्के हों, सस्ते और टिकाऊ हों और आसानी से बिजली पैदा कर सकें.

दास के इस प्रयोग के बाद अब बायोटेक और बायोसाइंस के विशेषज्ञ मैकेनिकल इंजीनियर इस दिशा में एक बेहतर और टिकाऊ डिवाइस के डिज़ाइन को लेकर सोच रहे हैं. गौरतलब है कि दास ने आईआईटी खडगपुर से पीएचडी की डिग्री हासिल की है. एक साल पहले आईआईटी खडगपुर में भी यही प्रयोग किया गया था.

आईआईटी में हुआ था प्रयोग

एक दूरदराज गांव के धोबी घाट पर करीब 3000 वर्गमीटर के दायरे में गीले कपड़ों के साथ आईआईटी खडगपुर ने 2019 में यह प्रयोग किया था. कमर्शियल सुपर कैपेसिटर को कनेक्ट कर तब करीब 10 वोल्ट बिजली पैदा हुई थी, जिससे एक सामान्य एलईडी एक घंटे तक जल सकता था. तब इस रिसर्च में शामिल प्रोफेसर सुमन चक्रबर्ती ने कहा था कि ‘खुले में जो गीले कपड़े सुखाने के लिए डाले जाते हैं, उनसे बिजली पैदा होने की संभावना का यह प्रयोग वाकई महत्वपूर्ण है.’

जिन दूरस्थ इलाकों में बिजली की सप्लाई अब भी एक समस्या बनी हुई है, वहां इस तरह की तकनीकों से बिजली पैदा किए जाने के मकसद के दृष्टिकोण से आईआईटी ने इस प्रयोग को काफी अहम बताया था. तभी से इस तरह के प्रयोगों को और किफायती व और बेहतर ढंग से किए जाने की दिशा में शोध और रिसर्च जारी है.