कश्मीर को वो झंडा, जिसको फहराने की बात कर रही हैं महबूबा मुफ्ती

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एक साल पहले जब केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी किया, तब से ही कश्मीर में पहले तिरंगे के साथ फहराए जाने वाले राज्य के झंडे पर भी रोक लगा दी गई. राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती मांग कर रही है कि राज्य के झंडे को फिर से बहाल किया जाए.

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर के झंडा को फिर फहराने की बात की है. उन्होंने कहा है कि जिस तरह एक साल पहले तक कश्मीर के झंडे को फहराया जाता था, उसे फिर फहराया जाए. उन्होंने देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को फहराने से मना करने पर विवाद भी खड़ा कर दिया है. जानते हैं कैसा था कश्मीर का वो झंडा, जो अब अतीत बन चुका है.

एक साल पहले जब भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी किया तो राज्य का आधिकारिक झंडा भी इतिहास का हिस्सा हो गया,

संसद में एक संविधान संशोधन पास करके राज्य को दो यूनियन टेरिटरी में विभाजित कर दिया गया. भारत सरकार के इस फैसले के बाद राज्य के सेक्रेटेरियट से 25 अगस्त 2019 को राज्य का झंडा निकाल दिया गया. अब वहां केवल भारत का तिरंगा झंडा ही फहराता है.

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान की आर्टिकल 144 के तहत लाल रंग का एक अलग झंडा भी पहले स्वीकार किया गया था. इस झंडे का लाल रंग वास्तव में 1931 में डोगरा शासन के खिलाफ हुए एक प्रदर्शन के दौरान मारे गए लोगों के खून का प्रतीक था.

दरअसल 13 जुलाई 1931 में राज्य की राजधानी श्रीनगर में डोगरा शासन के खिलाफ एक प्रदर्शन का आयोजन हुआ था. प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 21 लोगों की मौत हो गई थी.

1952 में बना राज्य का अलग झंडा
7 जुलाई 1952 में राज्य की संविधान निर्माता सभा ने एक अध्यादेश पारित करके 11 जुलाई 1939 के झंडे को राज्य के आधिकारिक झंडे के रूप में स्वीकार किया था. दरअसल जम्मू-कश्मीर राज्य के झंडे को लेकर विवाद 2015 में हुआ था. जब राज्य बीजेपी के निर्वाचित विधायकों ने राज्य का झंडा फहराने से इनकार कर दिया था.

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तब महबूबा ने इसे फहराना जरूरी कर दिया था
जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने एक सर्कुलर जारी करके राष्ट्रीय झंडे के साथ राज्य के झंडे को फहराना अनिवार्य कर दिया था. हालांकि राज्य सरकार ने 20 घंटे के अंदर ही इस सर्कुलर को वापस ले लिया था.

लेकिन दिसंबर 2015 में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रेषित एक आदेश द्वारा सभी सरकारी बिल्डिंग्स और वाहनों पर राष्ट्रीय झंडे के साथ राज्य का झंडा लगाना संवैधानिक अधिकार बना दिया था.

जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा नेहरू-शेख समझौते का परिणाम
कोर्ट के इस आदेश के बाद राज्य के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री निर्मल कुमार ने कहा था कि राष्ट्रीय झंडे के बराबर में किसी भी झंडे को नहीं फहराया जा सकता है. दरअसल भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और तब के जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के बीच 1952 में एक समझौता हुआ था.

इसी समझौते में यह तय किया गया कि राष्ट्रीय झंडा तिरंगा होगा. लेकिन राज्य की शक्तियों को परिभाषित करने के लिए राज्य के झंडे को भी मान्यता दी गई. राष्ट्रीय झंडे के साथ ही राज्य के झंडे को भी फहराया जाएगा. वहीं शेख अब्दुल्ला ने यह आश्वासन दिया था कि राज्य का झंडा राष्ट्रीय झंडे का प्रतिरोधी नहीं होगा.

जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय झंडे का दर्जा
नेहरू-शेख समझौते पर इस बात की सहमति बनी कि तिरंगे को जम्मू-कश्मीर में वही दर्जा होगा जो शेष भारत में है. समझौते को बाद में राज्य की संविधान सभा ने 7 जुलाई 1952 को एक अध्यादेश के द्वारा राज्य के संविधान में शामिल कर लिया गया.

हालांकि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने जब रियासत का भारत में विलय करने का फैसला किया था. तब उन्होंने अलग संविधान और झंडे की कोई शर्त नहीं रखी थी. महाराजा ने भारत के अन्य राज्यों की ही तरह संविधानिक अधिकारों की मांग की थी. साथ ही उन्होंने भारतीय संविधान का पालन करने का आश्वासन दिया था.