‘अनपढ़ों’ के हाथ में ‘गांव की सरकार’, 35 फीसदी सरपंच लिख सकते हैं सिर्फ अपना नाम

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शैक्षणिक योग्यता हटने के बाद 2 हजार 726 में से 100 ग्राम पंचायतों में गांव की सरकार के मुखिया की कमान ‘अंगूठाटेक’ के हाथ में चली गई है.

जयपुर: राजस्थान में प्रथम चरण में चुनी गई गांव की सरकार की तस्वीर ‘धुंधली’ नजर आ रही है. शैक्षणिक योग्यता हटने के बाद 2 हजार 726 में से 100 ग्राम पंचायतों में गांव की सरकार के मुखिया की कमान ‘अंगूठाटेक’ के हाथ में चली गई है. इतना ही नहीं 35.54 फीसदी ऐसे सरपंच हैं, जो सिर्फ अपना नाम ही लिखना जानते हैं, यानि इनका ‘रिमोट कंट्रोल’ किसी दूसरे के हाथ में रहेगा.

यदि आपके गांव की सरकार का मुखिया खेत में काम करता या फिर पशु चराता हुआ नजर आए और गांव में सरपंचाई की कुर्सी पर ओर कोई बैठा रहे तो चौकिएगा मत. इस तरह की तस्वीर आपको ग्राम पंचायतों में देखने को मिल सकती है. शैक्षणिक योग्यता हटने के साथ ही इस बार 39 फीसदी ग्राम पंचायतों की कमान अंगूठाटेक और केवल अपना नाम लिखने वालों के हाथों में चली गई है. गांवों में इनकों ‘रिमोट कंट्रोल वाले सरपंच’ का नाम दिया जा रहा है.

राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार 87 पंचायत समितियों की 2 हजार 726 ग्राम पंचायतों में 96 ऐसे सरपंच हैं जो की ‘अंगूठाछाप’ हैं, जिन्हें अपना नाम तक नहीं लिखना आता है. वहीं, 969 ग्राम पंचायतों में सरपंच की कमान उनके हाथों में है जो सिर्फ अपना नाम ही लिखना जानते हैं. वो सरकारी योजनाओं के बारे में जानते तक नहीं है. सबसे ज्यादा बाड़मेर में निरक्षर सरपंचों की संख्या 14 है.

वहीं, केवल अपना नाम लिखने वालों की संख्या बाड़मेर में 76 के करीब है. इस बार के चुनावों में 2.34 फीसदी ऐसे सरपंच हैं जो कि किसी ना किसी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं. जब इस मामलेेे में नवनिर्वाचित सरपंचों से ज़ी मीडिया ने बात की तो उनका कहना है कि जिस तरीके से पहले गांव की सरकार चलती आई है, उसी तरीके से गांव में विकास करेंगे.

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गांवों में कितनी पढ़ी लिखी है मुखिया
निरक्षर-96-(3.52 फीसदी)
साक्षर-969-(35.54 फीसदी) (केवल अपना नाम लिखना जानते हैं)
5वीं तक पास-174-(06.38 फीसदी)
8वीं तक पास-307-(11.26 फीसदी)
10वीं तक पास-390-(14.30 फीसदी)
12वीं तक पास-324-(11.88 फीसदी)
ग्रेजुएट-298-(10.93 फीसदी)
पोस्ट ग्रेजुएट-102-(03.74 फीसदी)
प्रोफेशनल-64-(02.34 फीसदी)
PHD होल्डर-1-(00.03 फीसदी)
कुल-2726

बिना पढ़े लिखे जनप्रतिनिधियों को डिजिटल क्रांति के इस युग में काम करना आसान नहीं होगा. चुनाव लड़ने का अधिकार सभी को है, लेकिन गांव, पंचायत और जिले की सरकार चलाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है. योजनाओं के ऑनलाइन अपडेशन से लेकर ऑनलाइन ही लाभार्थियों को पेमेंट करना होता है. वार्ड पंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य तो भले ही बिना शैक्षणिक योग्यता के चल सकते हैं, लेकिन ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच, पंचायत समिति में प्रधान और जिले में जिला प्रमुख को कई शक्तियां और अधिकार मिले हुए हैं. इसलिए गांव की सरकार चलानें में इनकी अहम भूमिका है.

यदि ये पढ़े लिखे नहीं होंगे तो ये किसी अन्य के हाथों की ‘कठपुतली’ बनकर ही रह जाएंगे. इनकी शक्तियों का दुरुपयोग भी होगा. इस पर पढ़े लिखे नवनिर्वाचित सरपंचों का कहना है की पढ़े लिखे नहीं है कई आदेशों की तकनीकी भाषा और ऑनलाइन काम समझ नहीं पाएंगे. डिजिटल युग में अनपढ़ों के भरोसे गांव की सरकार क्यों सौंप रहे हैं? पढ़े-लिखे नहीं होने की वजह से कई दिक्कतें महसूस होंगी. सरपंच पढ़ा-लिखा नहीं होगा तो वह किसी ओर की कठपुतली ही रहेगा.

बहरहाल, चुनावों में लंबी-लंबी कतारों में लगे युवाओं से लेकर बुजुर्गों ने कहा है कि उन्हें अपने गांव की सरकार की कमान पढ़े-लिखे और  काम करने वाले के हाथ में देनी है, लेकिन राजनीति में पढ़ाई लिखाई गौण हो गई. तकनीकी युग में पंचायतों की कमान अंगूठा छाप सरपंचों के हाथ में चली गई. सवाल ये है कि क्या सरपंच अब सचिव के इशारों पर नाचेगा या फिर उनके घर में ओर कोई सरपंचाई करेगा.