गरीब मरीजों को क्यों नहीं कर रहे भर्ती, जबकी निजी अस्पतालों में खाली पड़े हैं EWS बेड

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दिल्‍ली के प्राइवेट अस्‍पतालों में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए तय बेड खाली पड़े होने के बावजूद अस्‍पताल मरीजों को भर्ती नहीं कर रहे हैं. दिल्‍ली में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आ रहे हैं.

नई दिल्‍ली. कोरोना महामारी ने गरीब मरीजों के इलाज में मुश्किलें पैदा कर दी हैं. इनमें भी नॉन कोविड मरीजों पर दोहरी मार पड़ रही है. एक तरफ दिल्‍ली के सरकारी अस्‍पतालों के कोरोना अस्‍पताल बन जाने से इन मरीजों को भगाया जा रहा है. वहीं प्राइवेट अस्‍पतालों में भी आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए तय बेड खाली पड़े होने के बावजूद निजी अस्‍पताल मरीजों को भर्ती नहीं कर रहे हैं. दिल्‍ली में ऐसे सैकड़ों मामले आ रहे हैं जब मरीजों को मुफ्त केटेगरी में इलाज के लिए मना किया जा रहा है जबकि पेड केटेगरी में भर्ती करने के लिए अस्‍पताल तुरंत तैयार हो जाते हैं.

दिल्‍ली के इंस्‍टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज में इलाज के लिए गए कई लिवर मरीजों का कहना है कि जैसे ही वे कहते हैं कि पैसा नहीं है और ईडब्‍ल्‍यूएस कोटे के तहत इलाज कराना है तो तुरंत कह दिया जाता है कि बेड नहीं है या फिर भुगतान करना पड़ेगा. लिवर की गंभीर समस्‍या से जूझ रहे यूपी के यासीन का इलाज कराने अस्‍पताल पहुंचे उनके बेटे फरमान ने बताया कि पिता के इलाज के लिए उन्‍होंने खुर्जा का अपना घर बेच दिया है. वे पांच भाई-बहन हैं, किसी की भी शादी नहीं हुई है. अब सभी सड़क पर आ गए हैं लेकिन पिता के इलाज के लिए घर नहीं बेचते तो क्‍या करते. फरमान कहते हैं, ‘अस्‍पताल में करीब 70 हजार रुपये रोजाना का खर्च आ रहा है. आईएलबीएस में हमने अपना इनकम सर्टिफिकेट भी दिखाया लेकिन उन्‍होंने कहा कि ये यहां पर नहीं चलता. मरीज भर्ती कराना है तो पैसे देने ही पड़ेंगे.’

वहीं मरीज योगेश राठौर के भाई ने बताया कि वे योगेश को पहले दिल्‍ली के एक सरकारी अस्‍पताल में ले गए जहां इलाज ठी‍क न मिलने पर वे उसे एक प्राइवेट अस्‍पताल में बीपीएल कार्ड और आधार कार्ड दिखाकर ईडब्‍ल्‍यूएस में भर्ती करने के लिए मांग की लेकिन उन्‍होंने भर्ती करने से साफ मना कर दिया. साथ ही कहा कि पैसा जमा कर के इलाज कराओगे तो बहुत जल्‍दी आराम होगा और बेहतर इलाज होगा. मरीज की हालत ज्‍यादा खराब थी तो भर्ती कराना पड़ा लेकिन अब अस्‍पताल को देने के लिए पैसे नहीं है इसलिए लोगों से मदद मांग रहे हैं.
यूट्रस में कैंसर की मरीज नाजिया कहती हैं उन्‍हें सरकारी अस्‍पताल में भर्ती नहीं किया गया तो वे कई प्राइवेट अस्‍पतालों में ईडब्‍ल्‍यूएस केटेगरी में भर्ती होने के लिए पहुंची लेकिन कोरोना और बेड खाली न होने की बात कहकर भगा दिया.

फेंफड़ों के कैंसर से हाल ही में मरे किशनलाल के बेटे अंकित ने बताया कि वे अपने पापा को इलाज के लिए कई सरकारी अस्‍पतालों में लेकर गए जहां कोरोना की बात कहकर वापस भेज दिया. इसके बाद वे दो प्राइवेट अस्‍पतालों में ईडब्‍ल्‍यूएस केटेगरी में इलाज के लिए पहुंचे लेकिन वहां भी बेड न होने की बात कहकर भगा दिया. आखिरकार पिता का देहांत हो गया.

इन अस्‍पतालों में खाली पड़े हैं ईडब्‍ल्‍यूएस केटेगरी के बेड

दिल्‍ली के सर गंगाराम अस्‍पताल में चार अगस्‍त के आंकड़ों के अनुसार 68 ईडब्‍ल्‍यूएस कोटे के बेड में से 11 बेड पर मरीज भर्ती हैं और बाकि खाली पड़े हैं. वहीं 31 जुलाई 2020 के मौजूदा आंकड़ों पर अनुसार अलावा मूलचंद अस्‍पताल दिल्‍ली में 14 ईडब्‍ल्‍यूएस बेड में से तीन पर ही मरीज भर्ती हैं. धर्मशिला नारायणा सुपरस्‍पेशलिटी अस्‍पताल वसुंधरा एन्‍क्‍लेव में क्रिटिकल, नॉन क्रिटिकल और कोविड के कुल 20 बेड में से 11 बेड खाली पड़े हैं. मैक्‍स अस्‍पताल शालीमार बाग के कुल 28 में से कोटे के 8 बेड खाली हैं. फॉर्टिस एस्‍कॉर्ट में कुल 31 ईडब्‍ल्‍यूएस बेड में से सिर्फ तीन बेड पर ही मरीज थे और बाकी बेड खाली थे. एनएचआई कैलाश कॉलोनी के कुल आठ ईडब्‍ल्‍यूएस में से दो बेड भरे हैं. एमजीएस पंजाबी बाग के सात में से एक बेड ही भरा हुआ है.

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अस्‍पताल प्रशासन बोला, मांगी है नॉन कोरोना मरीजों को भर्ती करने की अनुमति

कोरोना के चलते नॉन कोविड गंभीर मरीजों को भर्ती न करने के सवाल पर सर गंगाराम अस्‍पताल के मेडिकल डायरेक्‍टर की ओर से बताया गया, ‘सरकारी आदेश के अनुसार इस अस्‍पताल को 508 बेड कोरोना मरीजों के लिए रखने हैं. हमने सरकार से दरख्‍वास्‍त की है कि अस्‍पताल में आने वाले कोरोना के मरीजों की संख्‍या घट गई है. जिसका ब्‍यौरा दिल्‍ली कोरोना एप पर देखा जा सकता है. लिहाला नॉन कोविड मरीजों को भर्ती करने की अनुमति दे दी जाए. हमें अनुमति का इतजार है.

विशेषज्ञों का कहना है अस्‍पताल और सरकार दोनों हैं जिम्‍मेदार  

हेल्थ एक्टिविस्‍ट और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि दिल्‍ली में 61 प्राइवेट अस्‍पताल हैं जहां ईडब्‍ल्‍यूएस कोटे के तहत इलाज किया जाता है. ईडब्‍ल्‍यूएस कोटे के अधिकांश बेड लगभग सभी बड़े प्राइवेट अस्‍पतालों में खाली पड़े हैं लेकिन अस्‍पताल प्रशासन इलाज या सर्जरी के लिए जाने वाले नॉन कोविड मरीजों को कोरोना की बात कहकर वापस लौटा रहे हैं. पिछले तीन महीनों में सैकड़ों मरीज इलाज न मिलने की शिकायतें कर चुके हैं.

जहां तक कोरोना की बात है तो ईडब्‍ल्‍यूएस में आने वाले कोरोना के ज्‍यादातर मरीज सरकारी अस्‍पतालों में भर्ती हैं. तो सबसे बड़ा सवाल है कि खाली पड़े बेड पर ये निजी अस्‍पताल नॉन कोविड पेशेंट को भर्ती क्‍यों नहीं कर रहे हैं. अस्‍पतालों की इन मनमानियों पर सरकार भी कोई कदम क्‍यों नहीं उठा रही है.

वहीं वरिष्‍ठ स्‍वास्‍थ्‍य पत्रकार निशि भाट कहती हैं कि दिल्‍ली में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को इलाज देने के मामले में सिर्फ अस्‍पताल ही नहीं बल्कि सरकार भी लापरवाह है. बड़े प्राइवेट अस्‍पतालों में एक सर्जरी के लिए 15-20 लाख रुपये चार्ज करते हैं. यही खर्च ईडब्‍ल्‍यूएस कोटे के मरीजों के लिए होता है. ऐसे में अन्‍य मरीजों से तो तुरंत वसूली हो जाती है लेकिन ईडब्‍ल्‍यूएस का भुगतान सरकार को करना होता है, जिसे रिम्‍बर्स होने में भी वक्‍त लग जाता है. कई बार बिल अटक भी जाते हैं.

इसके अलावा जो एक मुख्‍य चीज है वह दवाओं के रेट रिवाइज न होने की है. सरकार दवाओं के रेट जल्‍दी रिवाइज नहीं करती, भुगतान के समय एक ही रेट कई साल चलता है. प्राइवेट अस्‍पताल मरीजों को महंगी दवाएं बेचते हैं, कमीशन वसूल करते हैं लेकिन सरकार को जब बिल भेजा जाता है तो तय रेट होता है और प्राइवेट अस्‍पतालों को दवाओं से कमीशन भी नहीं मिल पाता है. जिसकी वजह से ये कोटे के मरीजों के इलाज के लिए जल्‍दी ही तैयार नहीं होते. इसके लिए सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए.