प्राकृतिक सौंदर्य से भरा है, राजस्थान का कश्मीर माउंट आबू

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मानसिक विकृतियों के अधीन, भागती दौड़ती जिन्दगी में सुकून के पलों की तलाश करते मानव को सच्चे, सुख, शान्ति की अनुभूति कराने में सक्षम है राजस्थान का कश्मीर कहा जाने वाला पर्वतीय पर्यटन स्थल माउंट आबू. मानव जहां माउंट आबू के प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित होकर अल्पकाल की खुशी का अनुभव करता है, वहीं सूक्ष्म चेतन शक्ति आत्मा अविनाशी सुख, शान्ति की गहन अनुभूति भी करती है. यहां रहने वाले तपस्वी, राजऋषि, राजयोगी, सन्यासी, साधकों की ओर से की जाने वाली साधना से उत्पन्न महौल मनुष्य को न केवल मानसिक विकृतियों से मुक्त करता है, बल्कि जीवन जीने की कला की अमिट छाप भी मन में ले जाता है.

आबू रोड़ रेलवे स्टेशन से 24 किलोमीटर की दूरी पर हिमालय और नीलगिरी पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य, समुद्र तल से 5800 फीट की ऊंचाई पर बसा है विश्व का सबसे बड़ा तीर्थ स्थान अलौकिक ऊर्जा से भरपूर माउंट आबू. राजस्‍थान का नाम सुन कर लोगों के जहन में एक ही बात आती है, रेत के धोरे, गर्म हवाएं और बबूल व कीकर के झाड़. थोड़ा ज्यादा सोच लिया जाए तो बड़ी बड़ी हवेलियां या इतिहास की विरासत को अपने अंदर संजोए बैठे रजवाड़ेां के महल. राजपूती शान दिखाते भोज और कई अलग-अलग रंगों को अपनी पहचान बनाए शहर. लेकिन अलग अलग रंगों को संजोए रखे इस राजस्‍थान का एक रंग ऐसा भी है जिसे हिल स्टेशन के तौर पर जाना जाता है. ये है माउंट आबू. सिरोही के पास अरावली की पहाड़ियों में बसे माउंट आबू की पहचान राजस्‍थान के इकलौते हिल स्टेशन के तौर पर मशहूर है. यहां पर साल भर सैलानियों का तांता लगा रहता है. न‌ सिर्फ एक हिल स्टेशन बल्कि माउंट आबू एक धार्मिक पहचान भी अपने में संजोए है. कहते हैं ऋषि देव वाल्मिकी यहां पधारे थे.

विश्वविख्यात पर्वतीय पर्यटन स्थल माउंट आबू को राजस्थान का कश्मीर भी कहा जाता है. अरावली पर्वत श्रृंखलाओं की प्रशांत गोद में प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण यहां की शीतल वादियां सैलानियों को अपने ओर आकर्षित कर लेती हैं. यहां की बड़ी-बड़ी चटटानों एवं घने जंगलों में ऋषियों-महिर्षियों, साधकों की आज भी अनेकों गुफाएं मौजूद हैं जो प्राचीन भारतीय संस्कृति की याद को तरोताजा कर देती हैं. माउंट आबू  के दर्शनीय स्थलों में यहां की हृदयस्थली ऐतिहासिक नक्कीझील, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा निर्मित आध्यात्मिक संग्रहालय तथा ओम शान्ति भवन, अधरदेवी, शंकरमठ, ज्ञान सरोवर, देलवाड़ा मंदिर, पीसपार्क, अचलगढ़, गुरूशिखर, गौमुख, सनसेट प्वाइंट शामिल है.

बस स्टेंड से नक्की झील होते हुए मात्र डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय कर प्रकृति की प्रशांत गोद के मध्य स्थित है प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का अंतर्राष्ट्रीय मुख्याल्य पांडव भवन. यह विद्यालय दिव्य एवं अलौकिक अनुभूतियों की अदभुत एवं अखुट खान है जहां हर कोई प्रवेश करते ही अपने आप को भौतिकी एवं अल्पकालिक चकाचौंध के बाह्य जगत से दूर प्रभू पे्रम की असीम शक्तियों के पुंज से जुुड़ जाने का सुखद अनुभव करता है. प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की स्थापना स्वयं परमपिता शिव निराकार ज्योतिबिन्दू परमात्मा ने सन् 1937 में दादा लेखराज के तन में प्रवेश होकर सिंध हैदराबाद में की थी.

ज्ञान सरोवर परिसर से महज दो किलोमीटर की दूरी पर घाटियों में बने विश्वविख्यात देलवाड़ा मंदिर की स्थापत्य कला की अनूठी मिसाल है, जिसकी कलाकारी को देखते ही हर कोई आश्चर्यचकित होने के लिए मजबूर हो जाता है. मंदिर में जैन तथा हिन्दु संस्कृति के समन्वित दर्शन को उजागर करते हुुुए नृत्य-नाटय कला के अदभुत एवं चिताकर्षक शिल्प चित्र उतकीर्ण है. मन्दिर परिसर में उपलब्ध शिलालेखों के अनुसार 170 फीट लंबे 90 फीट चौड़े भू-खण्ड पर सन 1031 ई. में 1500 शिल्पीयों तथा 1200 श्रमिकों के 14 वर्ष के अथक प्रयास से इस मन्दिर का निर्माण किया गया था. देलवाड़ा मंदिर से कुछ ही दूरी पर अचलगढ़, गुरूशिखर तथा अधरदेवी मंदिर भी यहां आने वाले पर्यटकों की आस्था के केंद्र है.

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माउंट आबू की ïहृदयस्थली नक्की झील भी अपनी प्रसिद्वी में किसी से कम नहीं है. यहां आने वाले सैलानी झील में नौकाविहार किए बिना वापसी का रूख नहीं करते हैं.  गुजरात सीमा से सटा होने के कारण यहां पर गुजराती संस्कृति का ज्यादा बोलबाला है. लेकिन ग्रीष्म तथा शरद ऋतु में यहां के ऐतिहासिक पोलोग्राउंड में होने वाले मेलों के आयोजन में भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों से कलाकार एकत्रित होते हैं और एक ही रंगमचं पर विविध भारतीय संस्कृतियों की उत्कृष्ट प्रस्तुतियां देकर दर्शकों अथवा सैलानियों को मंत्रमुग्ध करने के लिए बाध्य कर देते हैं.

अत्याधुनिक चिकित्सा प्रणालीयुक्त ग्लोबल अस्पताल देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले मरीजों के लिए वरदान बना हुआ है. एक ही छत के नीचे अनेक प्रकार की बीमारियों से मुक्ति दिलाने को विभिन्न चिकित्सकीय विभाग सेवा में संलग्र है. विशेषकर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में अस्पताल की ओर से निशुल्क सेवाएं देने में अस्पताल के चिकित्सकों की टीम सदैव तत्पर रहती है.

गुरुशिखर मार्ग स्थित पीसपार्क यहां आने वाले देशी विदेशी सैलानियों के लिए केवल आकर्षण का केंद्र ही नहीं बल्कि यहां लाखों की संख्या में हरे भरे पेड़ों के मध्य, हरीतिमा से आच्छादित वातावरण के बीच मन को शान्ति से भरपूर करने के लिए मेडिटेशन रूम भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यहां लेजर शो, ईश्वरीय ज्ञान की प्रदर्शनी के जरिए जीवन जीने की कला का निशुल्क रूप से मार्गदर्शन किया जाता है.

इतिहास पुरूष यशस्वी श्रीराम के सूर्यवशं के कुलगुरू महर्षि वशिष्ट आश्रम जो अग्नि यज्ञ के लिए प्रसिद्व है की रमणीय पृष्ठभूमि का यह मंदिर चौहान, सोलंकी, परमार एवं परिहार समुदायों के उत्पति स्थल वश्ष्टि आश्रम तक पहुंचने के लिए वर्तमान में 750 सीढिय़ां उतरनी पड़ती हैं.  घाटी में इन सीढिय़ों को उतरते चढ़ते समय मार्ग में घने वृक्षों के झुरमुट में कई ऐसे पाषाणखंड उपलब्ध हैं जहां विशाल चट्टानों की जिनमें आंख, नाक वा मुंह जैसी आकृतियां उभरी हुुई हैं.

इस भव्य किले में कई जैन व हिदुं मंदिर बने हुए हैं जिनमें अचलेश्वर महादेव, कांतीनाथ जैन मंदिर प्रमुख है. इसमें सोने की परत चढ़ी मूर्ति है. अचलेश्वर महादेव मंदिर के समीप मंदाकिनी कुंड व परमार धारावर्ष की एक मूर्ति स्थित है. राणा कुंभा ने इस गढ़ का निर्माण 14वीं शताब्दी में करवाया था. इसी प्रकार सैलानियों को आकर्षित करने के लिए नागतीर्थ, व्यासतीर्थ, गौतम आश्रम, जमदिगनआश्रम, शंकरमठ, नीलकंठ महादेव, संतसरोवर, अग्रिगुफा, स्थानीय जामा मस्जिद, गुरूद्वारा और गिरजाघरों सहित सैकड़ों धार्मिक एवं दर्शनीय स्थल माउंट आबू में मौजूद है.