विधायकों खरीद-फरोख्त लोकतंत्र को कमजोर करता है :- पत्रकार सुधीर बिश्नोई

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जयपुर:- विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक तरीके से चलने वाले देश हिंदुस्तान के लिए वर्तमान का दौर काफी घातक साबित हो रहा है। जिस प्रकार से पिछले कुछ समय में लोकतांत्रिक तरीके से चलने वाले देश में चुनी हुई सरकारों को तोड़कर विधायकों का दल बदल करना ,अपने निजी स्वार्थ को देखते हुए लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार-तार करना बहुत ही घातक साबित हो रहा है , जैसा की आप सभी को पता है कि गोवा ,कर्नाटक तथा उसके बाद मध्यप्रदेश और अब वर्तमान में राजस्थान में जिस प्रकार से राजनीतिक परिस्थितियां बनी है । वह अपने आप में यह साबित करती हैं कि हम किस प्रकार से लोकतंत्र को खत्म करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं तमाम राजनीतिक पार्टियां अपने – अपने समय में चाहे तो कांग्रेस जब सत्ता में रही है या फिर भारतीय जनता पार्टी वर्तमान में जिस प्रकार केंद्र में एक छत्रप राज कर रही है उसे से स्पष्ट हो रहा है कि सत्ता के नशे में लोकतंत्र को तार-तार करने का काम किया जा रहा है।

राजस्थान में जिस प्रकार से हॉर्स ट्रेडिंग से लेकर के विधायकों की खरीद-फरोख्त का जो मामला कानून की अड़चनों में जो पेचीदा दिनोंदिन होता जा रहा है उससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान समय में राजनीतिक से जुड़े हुए लोग अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को तोड़ने का काम करते हैं हम इस बात को भी स्पष्ट समझते हैं कि जिस गांधी के सपनों का भारत को हम देखने की कोशिश कर रहे हैं उस देश में अगर इस प्रकार से लोकतंत्र की निर्मम हत्या की जाएगी तो निश्चित तौर पर एक दिन हमारे देश में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा।

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विश्व की कहीं ऐसे देश हैं जहां पर आज भी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी का वर्चस्व रहा है जिसको देखते हुए उस देश का लोकतंत्र धीरे-धीरे खत्म हो जाता है और उस देश में एक पार्टी का राज रह जाता है और यह भी आप अच्छी तरह समझते हैं कि जिस जिस देश में सिंगल पार्टी राज रहा है वह देश हमेशा अपने देश से लोकतंत्र को खत्म करता जा रहा है में मानता हूं कि हिंदुस्तान में जिस प्रकार से आज हम अपने आप को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र तरीके से चलने वाले देश मानते हैं तो हमें इस देश की मान मर्यादा पर भी ध्यान रखने की जरूरत है ताकि देश के लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे।

यह केवल इन वरिष्ठ नेताओं के दल बदलने, बगावत करने की बात नहीं है, वास्तव में यह हमारे लोकतंत्र को चलाने वाली उस सत्ता लोलुप मानसिकता को दिखाता है जो सत्ता सुख भोगने के लिए किसी भी सीमा तक गिरने को तैयार है. ‘प्यार और युद्ध में सब जायज है’ का नारा उछालती हुई नेतृत्व की यह मूल्यविहीन छवि अपने सिवाय किसी का भला नहीं कर सकती. जो अपने दल का नहीं हुआ वह देश और समाज का क्या होगा? ऐसा नेतृत्व जनता पर क्या प्रभाव डालेगा यह विचारणीय है.