‘पंडित’ और ‘सरस्वती’ उपाधि पाने वाली पहली महिला क्यों बनी थी ईसाई?

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“जीवन जब ईसा को समर्पित है/डरने को कुछ नहीं/खोने को कुछ नहीं/पछताने को कुछ नहीं…” इस कविता की कवयित्री 19वीं सदी की एक भारतीय महिला हैं. याद कीजिए ये वो समय था, जब सती प्रथा, नारकीय विधवा जीवन, बालिका शिक्षा का विरोध, अंतर्जातीय विवाह की मनाही जैसी सामाजिक बुराइयां थीं, तो दूसरी तरफ, महामारियों के खतरे लगातार रहते थे. उस समय, ये सारी घटनाएं एक महिला के एक जीवन में घटीं और वह मिसाल बनती चली गई.

अनसंग हीरोज़ की लिस्ट में पंडिता रमाबाई का नाम यादगार तो है, लेकिन तकरीबन भुलाया जा चुका है. वो महिला जो समाज और व्यवस्था की तमाम दीवारों को तोड़कर आगे बढ़ी और दुनिया भर में अपना परचम लहराकर आई, वो हिंदू महिला जिसने ईसा के प्रेम का उदाहरण पेश किया और वो पहली महिला, जिसे पुरुषों के समाज ने ‘पंडिता’ और ‘सरस्वती’ जैसी उपाधियां दीं, क्या आप उस रमाबाई के बारे में जानते हैं?

जब ब्रिटिशों ने कब्ज़ा नहीं किया था, उसके पहले पूना के राजघराने की एक महिला को संस्कृत पढ़ाने वाले एक ब्राह्मण अनंत शास्त्री डोंगे ने 44 साल की उम्र में नौ साल की लक्ष्मीबाई से विवाह किया था. लेकिन इस विवाह को उन्होंने उदाहरण बनाते हुए लक्ष्मीबाई को संस्कृत की शिक्षा दी. उनका दावा था कि शास्त्रों में कहीं ऐसा उल्लेख नहीं कि लड़कियों को शिक्षा नहीं दी जाए.

लगातार यात्राएं, भक्ति और शिक्षा देते हुए शास्त्री ने अपना जीवन गुज़ारा लेकिन लक्ष्मीबाई को शिक्षा देना बाद में रंग लाने वाला था. साल 1858 में जन्म लेने वाली रमाबाई ने संस्कृत की शुरूआती शिक्षा अपनी मां से ही ली और फिर और शिक्षा जब मौका मिला, तब​ पिता से. जब रमाबाई 16 साल की थीं, तब हैज़े की महामारी और उसके कारण बने भुखमरी के हालात में उनके माता, पिता और बहन का देहांत हो गया.

अनाथ रमाबाई के पास अपनी शिक्षा की ताकत थी, जिसके ज़रिये उन्होंने संस्कृत के व्याख्यान देना शुरू किए. उनकी कीर्ति फैलने लगी और 20 साल की उम्र में कलकत्ता के विद्वानों ने उनके साथ शास्त्रार्थ किया. नतीजा यह हुआ कि विद्वानों ने पहली बार किसी महिला के तौर पर रमाबाई को ‘पंडिता’ का खिताब दिया और बाद में उन्हें ‘सरस्वती’ की उपाधि भी दी गई.

देश भर में रमाबाई अपने व्याख्यानों से चर्चित हो रही थीं और वह वक्त भी दूर नहीं था, जब उनकी कीर्ति विदेशों में होने वाली थी. महिलाओं की मुक्ति के लिए एक व्याख्यान के समय शास्त्रों में विरोधाभासी बातों से चकित हो चुकी रमाबाई ने अपने भाई को भी 1880 में महामारी में खोया. इसी साल, उन्होंने हिंदू परंपराओं से अलग गैर ब्राह्मण पुरुष के साथ विवाह किया, लेकिन दो साल बाद ही एक छोटी सी बच्ची को गोद में छोड़ उनके पति भी महामारी के चलते काल के गाल में समा गए.

विधवा होने के बावजूद पारंपरिक तौर पर नारकीय जीवन जीने से मना करने वाली रमाबाई ने अपनी मुक्ति की यात्रा खुद करने का बीड़ा उठाया. पूना लौटीं तो वहां कुछ समाज सुधारकों की मदद से उन्होंने बेहद अमानवीय जीवन बिता रही हिंदू विधवाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए एक संस्था खोलने की शुरूआत की. यहां से, मुक्ति का उनका एक निजी मिशन और एक सामाजिक मिशन समानांतर शुरू हो गया.

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रमाबाई ने उस समय हिंदू महिलाओं को भी दयनीय स्थिति के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए उन्हें ‘मूर्ख और आलसी’ कहा था. उन्होंने कहा था कि उन्हें शादी अपनी मर्ज़ी से और बड़ी उम्र में करना चाहिए. बालिका शिक्षा की हिमायती रमाबाई ने दूसरी तरफ, भारतीय पुरुषों की महिलाओं को लेकर दोगली सोच पर भी हमला बोला था. इस तरह के लेक्चर देने और किताबें लिखने, महिलाओं की स्थिति ​सुधारने के कदम उठाने के बीच उन्होंने इंग्लैंड जाने के लिए फंड जुटाना भी शुरू किया था.

पूना की एंग्लिकन संस्था का सहयोग रमाबाई को मिला था, लेकिन उस वक्त रमाबाई का इरादा ईसाई होने का नहीं था. लेकिन 1883 में रमाबाई ने ईसाई धर्म अपनाया और तब तक वह अंग्रेज़ी भी सीख चुकी थीं. लेकिन, यह कोई सामान्य धर्म परिवर्तन नहीं था. रमाबाई ने ईसाइयत अपनाई थी लेकिन चर्च में पुरुष प्रधान व्यवस्था को मानने से इनकार किया था और एंग्लिकन सिस्टर्स संस्था के आदर्शों के तहत सिर्फ बाइबल की सत्ता कबूल की थी.

बहरहाल, ये सब तब हो रहा था, जब मेडिकल की​ पढ़ाई के लिए रमाबाई ब्रिटेन पहुंची थीं. ब्रिटेन से 1886 में उन्होंने अमेरिका की यात्रा की ताकि वो अपनी संबंधी और पहली भारतीय महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी के ग्रैजुएशन समारोह में​ शिरकत कर सकें. इस पूरे समय के दौरान अमेरिका और कनाडा में रमाबाई ने लेक्चर दिए. रमाबाई ने अंग्रेज़ी में एक ​किताब भी लिखी ‘द हाई कास्ट हिंदू वूमन’.

कई भाषाएं सीख चुकीं, खासी शिक्षा ले चुकीं रमाबाई 1889 में बॉम्बे लौटीं. ईसाई बन चुकीं रमाबाई 1890 में पूना गईं और वहां महिलाओं की स्थिति को लेकर और पुरुष प्रधान समाज के अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाने लगीं. 1891 में रमाबाई महसूस कर रही थीं कि उन्होंने ईसाई धर्म तो पाया लेकिन ईसा को नहीं, तो दूसरी तरफ अपने सामाजिक दायित्व को एक आकार देने की ज़रूरत भी उन्हें सता रही थी.

महिलाओं के सशक्तिकरण के मकसद से साल 1896 में केड़गांव में उन्होंने 100 एकड़ के क्षेत्र में मुक्ति सदन शुरू किया, जो अब पंडिता रमाबाई मुक्ति मिशन के नाम से संचालित संस्था है. 1900 में यहां करीब 2000 महिलाएं और बच्चे रमाबाई के आश्रय में थे. यहां से रमाबाई बाइबल के मराठी अनुवाद के साथ ही, दूसरी भाषाएं सीखने और ​मुक्ति सदन को नई कामयाबियों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम करती रहीं.

रमाबाई वह महिला थीं, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के शिकागो में दिए गए भाषण में हिंदू संस्कृति के गौरवगान पर सवाल उठाकर कहा था ‘हिंदू धर्म और संस्कृति इतनी महान है, तो महिलाओं की स्थिति इतनी खराब क्यों है?’ इस पर खासा विवाद हुआ था और विवेकानंद भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी. अंतत: आज भी मुंबई में गिरगाम इलाके में एक सड़क पर रमाबाई का नाम बाकी है, लेकिन भारत के ज़हन में न के बराबर.