CSR फंड से हो कर्मचारियों का टीकाकरण तो सरकार पर कम होगा बोझ: किरण मजूमदार शॉ

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बायोकॉन लिमिटेड की चेयरपर्सन और प्रबंध निदेशक किरण मजूमदार शॉ को उम्मीद है कि भारत में जून 2021 तक कोविड-19 की वैक्सीन आ जाएगी. उन्होंने कहा, हालांकि इसे सभी लोगों तक पहुंचाना एक चुनौती होगी. शॉ कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उन्होंने सरकार को उन सभी कॉर्पोरेट्स को उनके कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी फंड से कर्मचारियों का टीकाकरण करने को कहा है. उन्होंने कहा कि इससे सरकार का बोझ कम होगा. न्यूज 18 की सहयोगी वेबसाइट मनीकंट्रोल ने किरण मजूमदार शॉ से इस पर बातचीत की.

कोविड-19 ने लाइफ साइंस में रिसर्च और इनोवेशन के मॉडल को कैसे बदला?

मुझे लगता है कि पूरी दुनिया अब बस बायोटेक्नोलॉजी पर ध्यान दे रही है क्योंकि यह एक बहुत महत्वपूर्ण वर्ल्ड हेल्थ केयर सेक्टर है. इसलिए मेरा मानना है कि भारत कोरोना वायरस को कंट्रोल करने के लिए बिल्कुल सही रास्ते को चुन रहा है. जैसा कि आप जानते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन बनाने वाला देश है. लेकिन रोटावायरस वैक्सीन के अलावा हमने नई वैक्सीन टेक्नोलॉजी के लिए फंड नहीं दिया है. मुझे लगता है कि R&D में निवेश भारत को वैक्सीन इंडस्ट्री को आगे तक ले जाएगा.

भारत इनोवेशन के मामले में क्यों पीछे है?

इसका बड़ा कारण मेडिकल रिसर्च है, अगर आप देखें कि बायोकॉन जैसी कंपनी क्या कर रही हैं तो आपको बता दूं कि हम दो नोवल मोनोक्लोनल एंटीबायोटिक्स लेकर आए हैं और देश में ऐसा करने वाली हमारी इकलौती कंपनी है. मुझे लगता है कि हमें इसका विस्तार करने के लिए अमेरिका को लाइसेंस देना जरूरी है. क्योंकि एक एंटीबायोटिक्स भारत में बेची जा रही है लेकिन एक का पेटेंट एक्सपायर हो चुका है. मुझे लगता है कि डॉक्टर्स इस चीज को नहीं समझ पा रहे हैं. उनका ध्यान केवल फार्मा कंपनियों पर है. वे भारत में बनने वाली दवाईयों को गंभीरता से नहीं लेते हैं.

आप भी तो क्लिनिकल रिसर्च को बढ़ाने की बात कर रही हैं, इसके बारे में आपका क्या ख्याल है?देखिए, मुझे लगता है कि यह मेडिकल रिसर्च कम्यूनिटी के लिए भी है कि वह रिसर्च में निवेश करें. दुर्भाग्यवश, देश में क्लिनिकल रिसर्च इस स्तर पर नहीं है और मेरा मानना है कि इसे आगे बढ़ाना चाहिए. आज हम भारत में क्लिनिकल ट्रायल करते हैं, जब हम विदेशों के अन्य हिस्सों में इन ट्रायल को करते है तो मैं जानती हूं कि हमारे और उनके ट्रायल की क्वालिटी में कितना फर्क होता है. हमारे क्लिनिकल ट्रायलों में उनकी जितनी क्वालिटी नहीं होती है. हालांकि इन ट्रायल में लगने की लागत उनसे ज्यादा होती है. इसलिए मैं कहती हूं कि क्लिनिकल ट्रायल में सुधार और उसे आगे बढ़ाने की जरुरत है.

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क्या बायोकॉन किसी वैक्सीन मैनुफेक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूशन से पार्टनशिप की तलाश में है?

मेरा मानना है कि हर कंपनी को जरुरत है कि वह अपने हित और ताकत पर ध्यान दें. हमारे पास बड़ी संख्या में वैक्सीन कंपनियां हैं जो बहुत अच्छा काम कर रही हैं. हमारी सहायक कंपनी सिन्जिन वैक्सीन मैनुफेक्चरर्स को रिसर्च और डेवलेपमेंट की शुरुआती दौर से वैक्सीन डेवलेपमेंट सर्विस दे रही है, लेकिन वह खुद वैक्सीन नहीं बना रही है. मैं आपको बता दूं कि सिन्जिन ने कुछ mRNA वैक्सीन के लिए भी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी की है.

इनोवेशन फ्रंट पर बायोकॉन क्या कर रही है?

इनोवेशन के मामले में हम बहुत निवेश कर रहे हैं. इसके लिए हमने बोस्टन में अपनी एक सहायक कंपनी ‘बिकारा थेरापियूटिक्स’ भी खड़ी की है. यहां हम अत्याधुनिक एंटीबॉडी बना रहे हैं जो असल में हमारी बेंगलूरू की लैब में विकसित की गई है. बता दूं कि ये एंटीबॉडी कैंसर थैरेपी के क्षेत्र में बहुत कारगार साहिब हुए हैं.

भारत में कोविड-19 का टीकाकरण करने में कितनी लागत लगेगी और क्या चुनौतियां होंगी?

इस डबल डोस वैक्सीन की कीमत 200 रुपये प्रति डोज है. इसका मतलब है कि लोगों को इन दो डोज के लिए 400 रुपये खर्च करने होंगे, लेकिन यह सिर्फ वैक्सीन का खर्चा है, क्योंकि इसमें सिरींज, नीडल्स और टीकाकरण करने वाले का खर्च अलग से देना होगा जो वाकई में बहुत चुनौती पूर्ण है. अगर इसमें एडमिनिस्ट्रेटिव शुल्क नहीं लिया जाता है तो मेरे हिसाब से प्रति व्यक्ति खर्च कम से कम 500 रुपये होगा. अनुमान है कि देशभर के लोगों का टीकाकरण करने के लिए कम से कम 50,000 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है.

वैक्सीन के एडमिनिस्ट्रेशन और डिस्ट्रीब्यूशन में प्राइवेट सेक्टर कैसे भूमिका निभाता है, खासकर बायोकॉन?

KPMG के अनुसार, भारतीय कॉर्पोरेट्स ने वित्तिय वर्ष 2019 में सीएसआर फंड में 8,691 करोड़ रुपये का योगदान दिया है. किरन का मानना है कि लॉजिस्टिक के मामले यानी कोल्ड-चेन-प्रोडक्ट्स जैसे कि इंसुलिन और अन्य बायोलॉजिक ड्रग्स को संभालकर रखने में प्राइवेट सेक्टर सरकार की मदद कर सकते हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय भी बहुत बड़े पैमाने पर टीकाकरण को अंजाम देने की तैयारी में हैं जिसमें वह 10 मिलियन से शुरुआत कर इसे 100 मिलियन तक ले जाने की उम्मीद है.