आखिर क्यो दिवालिया होने जा रहा है इजरायल का पड़ोसी देश?

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लेबनान में बढ़ते आर्थिक संकट के बीच विदेश मंत्री नसीफ हित्ती ने इस्तीफा दे दिया. वे इसी साल जनवरी में प्रधानमंत्री हसन दियाब सरकार में वित्त मंत्री बने थे. माना जा रहा है कि हित्ती ने देश में गहराते आर्थिक संकट को देखते हुए इस्तीफा दे दिया. यहां महंगाई दर बढ़ने से गरीबी इतनी ज्यादा है कि लोग एक्सपायर्ड चीजें खाने पर मजबूर हैं. जानिए, क्या वजह है कि मध्य पूर्व के इस देश की हालत इतनी खराब है.

इस देश का इतिहास

लेबनान हिब्रू भाषा के एक शब्द- लिब्न से बना है, जिसका मतलब है सफेद. माना जाता है कि हरदम बर्फ से ढंके पहाड़ों के कारण इस देश को ये नाम मिला होगा. हालांकि बहुत खूबसूरत होने के बाद भी ये देश दुनिया की कुछ सबसे उथलपुथल भरी जगहों में से है. इसकी वजह ये है कि इसकी एक तरफ सीरिया है. दक्षिण में इजरायल है तो पश्चिम में साइप्रस है. सालों तक ईसाई और मुस्लिम धर्म में लड़ाई के बाद साल 1944 में लेबनान आजाद मुल्क बन गया.

शुरू हुई वर्चस्व की लड़ाई

हालांकि तब भी इसके भीतर की हलचल कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ती चली गई. असल में शुरुआत में इस देश का झुकाव अरब की तरफ था. साल 1952 में ईसाई धर्म के राष्ट्रपति कमील शमून के आने पर ये प्रो-वेस्ट तरीका अपनाने लगा. इससे जनता में गुस्सा भड़क गया. सरकार गिर गई. तब से असंतोष लगातार किसी न किसी कारण से चला आ रहा है. इसकी एक वजह हमेशा कट्टर दुश्मन देशों के बीच घिरा होना भी है.

इजरायल के गुस्से का शिकार

लेबनान को इजरायल विरोध देश गढ़ की तरह इस्तेमाल करते आए हैं. लेबनान सरकार उनपर रोक लगाने में अक्षम रही. इस वजह से इजरायल भी भड़का रहा और 70 के दशक में उसने उन आतंकी संगठनों पर हमला कर दिया, जो सीरिया से आकर लेबनान को गढ़ बनाए हुए थे. इन सब वजहों से लेबनान में लगातार राजनैतिक अस्थिरता गहराती गई, जिसका नतीजा महंगाई दर के बढ़ने, बेरोजगारी और गरीबी के रूप में दिख रहा है.

कैसी है देश की हालत

खराब इकनॉमी फिलहाल लेबनान का सबसे बड़ा संकट है. हालात ये हैं कि यहां सामान्य सुविधाएं भी नहीं हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां दिन में 20 घंटे बिजली जाना आम बात है. सड़कों पर कूड़े के ढेर जमा हैं लेकिन कोई सफाईकर्मी नहीं. आधी से ज्यादा आबादी के पास काम नहीं. यहां तक कि देश के पास अपने सैनिकों को देने के लिए अब खाना तक नहीं रहा. कोरोना के कारण संकट और गहरा गया है. बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां चली गईं. यहां तक कि देश पर कर्ज कुल जीडीपी से भी डेढ़ सौ गुना ज्यादा हो चुका है. कुल मिलाकर ये दिवालिया होने की कगार पर है.

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सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन

इसी वजह से लोग सड़कों पर उतर आए हैं. बेरोजगार हो चुके युवा कोरोना की परवाह किए बिना सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं. इसी साल अप्रैल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर आया था, जिसमें प्रदर्शन कर रहे युवाओं और पुलिस के बीच बहस हो रही है. वीडियो में एक युवक कहता है कि मैं भूखा हूं और तुम्हारे सामने हूं. तुम मारो मुझे. दूसरी तरफ से पुलिस कर्मी कहता है कि मैं तुमसे भी ज्यादा भूखा हूं. ये सुनते ही प्रदर्शन कर रहे लोग पुलिस से भी प्रदर्शन में शामिल होने की बात कहते हैं. इस एक छोटी सी घटना से ही लेबनान की हालत का अंदाजा लग सकता है.

वाट्सएप पर टैक्स का प्रस्ताव

बता दें कि लेबनान में सड़कों पर प्रदर्शन साल 2019 में तब शुरू हुए थे, जब वहां की सरकार ने वाट्सएप यूजर्स से टैक्स लेने की बात की. सरकार का कहना था कि देश की आर्थिक हालत को ठीक करने के लिए ऐसे कई कदम उठाने होंगे. वे इसके लिए हर यूजर से 6 डॉलर टैक्स लेना चाहते थे. इसे लेकर पूरे देश में भारी प्रदर्शन शुरू हो गए और कुछ ही घंटों में सरकार को अपनी बात वापस लेनी पड़ी लेकिन उसके बाद से ही गरीबी और महंगाई दर को लेकर प्रदर्शन चल ही रहे हैं.

हो रही राजनैतिक उठापटक

इसी दौरान तत्कालीन पीएम साद अल-हरीरी को इस्तीफा देना पड़ा और हसन दियाब की सरकार आई. हालांकि इससे मामले में कोई सुधार नहीं हुआ है. अब हालात ये हैं कि 1500 लेबनानी मुद्रा की कीमत एक डॉलर है. लोगों के पास खाना खरीदने की भी ताकत नहीं. इसी आर्थिक संकट को देखते हुए नागरिक मांग कर रहे हैं कि सारे नेता इस्तीफा दे दें और बिना किसी राजनैतिक कनेक्शन के जानकार आकर आर्थिक संकट कम करने को योजना बनाएं.