ओबामा ने क्यों किए राहुल, सोनिया, मनमोहन​ सिंह पर कमेंट? पब्लिसिटी स्टंट!

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अमेरिका में अचानक ‘Tell All Books’ यानी ‘पोल खोल’ किताबों की झड़ी क्यों लग रही है? अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की हालिया प्रकाशित किताब ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ में राहुल गांधी के लिए एक पैराग्राफ, सोनिया गांधी के लिए कुछ शब्द और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए कई पन्नों में ज़िक्र का मतलब आखिर क्या है? क्यों देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में ज़िक्र नहीं है? क्यों ओबामा ने भारत को इतनी तवज्जो दी और क्यों ऐसी बातें लिखीं, जो चर्चा या विवाद पैदा कर रही हैं?

अस्ल में, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित ओबामा अब भी दुनिया में सुनी जाने वाली आवाज़ हैं, इसलिए वो कुछ लिखते या कहते हैं तो उसका व्यापक असर तय है. अमेरिका ही नहीं, दुनिया के किसी भी हिस्से और किसी भी शख़्स के बारे में अगर ओबामा कुछ कहते हैं, तो उसे गंभीरता से लिया जाता है. लेकिन कांग्रेस नेताओं के बारे में ओबामा के शब्दों के क्या मायने हैं? ओबामा को ये सब कहने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी? इन तमाम सवालों के जवाब तक पहुंचने से पहले आपको जान लेना चाहिए कि ओबामा ने क्या लिखा है, जो बेहद चर्चा में है.

किस पर ओबामा ने क्या कहा?

डॉ. मनमोहन सिंह : समझदार, निष्ठावान, ईमानदार, सोनिया गांधी की सत्ता और उनके बेटे के लिए खतरा नहीं, भ्रष्टाचार से कोसों दूर, आदि.

सोनिया गांधी : चतुर, चालाक, मजबूरन बुद्धिमान, आदि.

राहुल गांधी : नर्वस, प्रभावित करने के लिए उतावले, आदि.

भाजपा : विभाजनकारी राष्ट्रवादी पार्टी!

ओबामा ने भारत की संस्कृति और इतिहास के बारे में जहां, बेपनाह सकारात्मक बातें की हैं, वहीं, भारत की मौजूदा राजनीति या उनके कार्यकाल के दौरान की सियासत को आड़े हाथों लिया. ओबामा की टिप्पणियों से देश में यह बहस भी चल पड़ी है कि ‘ओबामा के हिसाब से मनमोहन बड़े हैं या मोदी?’ जबकि ओबामा ने मोदी के बारे में किताब में कहीं कुछ नहीं लिखा. यहां से समझना चाहिए कि ओबामा की इस विवेचना का मतलब क्या है.

मोदी पर टिप्पणी क्यों नहीं?

चूंकि ओबामा ने अपनी इस किताब को अपने कार्यकाल अनुभवों पर केंद्रित किया है, इसलिए 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने मोदी उस वक्त सत्ता में आए थे, जब ओबामा का राष्ट्रपति के तौर पर दूसरा कार्यकाल चल रहा था. ओबामा ने अपनी यह किताब दो भागों में लिखी है इसलिए यह कयास है कि अगले भाग में मोदी के बारे में ओबामा की टिप्पणियां पढ़ने को मिलेंगी.

इस दावे के पीछे तर्क यह भी है कि 2015 में ओबामा भारत यात्रा पर आए थे. इसके बाद मोदी और ओबामा की और भी मुलाकातें होती रहीं. बहरहाल, मोदी पर टिप्पणियां इस किताब को भारत में ​और हिट कराने में मददगार ज़रूर साबित होंगी, यह कहना रॉकेट साइंस नहीं है.

क्या राहुल की इमेज खराब होगी?

इस बारे में बहस जारी है कि ओबामा की टिप्पणी के बाद राहुल गांधी के बारे में धारणाएं किस तरह प्रभावित होंगी? हालांकि कुछ विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ओबामा प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं इसलिए उनकी टिप्पणी असरदार तो साबित होगी. यह असर हो चुका है कि इन टिप्पणियों को ‘अपमानजनक, अभद्र’ बताते हुए ओबामा के खिलाफ केस दर्ज किए जा रहे हैं. लेकिन, कुछ विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.

वास्तव में, राहुल गांधी की एक इमेज को भारत में खासा प्रचार मिल चुका है. उनका मज़ाक बनाया जाना भारत में कोई नई बात नहीं रह गई है. इस तर्क से कुछ विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ओबामा की टिप्पणी को गंभीरता से लेने की गुंजाइश ही नहीं है क्योंकि उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही, जो पहले ही चर्चा में नहीं थी. दूसरी तरफ, ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जो राहुल के बारे में एक पैराग्राफ के विवरण को ओबामा की विलक्षण दृष्टि और व्यक्ति को बारीकी से समझने का हुनर भी बता रहे हैं.

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ओबामा ने घटाया और नेताओं का भी कद!

इस साल की 100 सबसे बेहतरीन किताबों में शुमार हो चुकी ओबामा की इस किताब में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का ज़िक्र है. वर्ल्ड लीडर्स में शुमार पुतिन को ओबामा ने महज़ एक दो वाक्यों की जगह देते हुए उन्हें ‘शारीरिक तौर पर छोटा, ध्यान न दिए जाने लायक, एक रेसलर जैसे बॉडी, पतले बाल और चढ़ी नाक व ताकती आंखों वाला’ व्यक्ति बताया. रूस के राष्ट्रपति का इतना उल्लेख ओबामा ने अपनी किताब में काफी समझा.

अब विशेषज्ञ अगर यह कहें भी कि ओबामा की किताब उल्लेखनीय साहित्य है और इशारों में बड़ी बातें करती है, तो भी चुनौती यह है कि इसे डिकोड कैसे किया जाए. दूसरी तरफ, ओबामा की किताब का मकसद यह भी समझा जा सकता है कि वो अपनी विचारधारा के तहत कुछ नेताओं का कद कम आंकने या बताने की कोशिश कर रहे हैं. इस तरह के विवरणों से विश्व राजनीति की क्या समझ ओबामा की किताब से मिलती है? यह विचार हो रहा है.

तो क्यों लिखे ओबामा ने ये पन्ने?

भारत और भारतीय सियासी ​शख़्सियतों के बारे में ओबामा का रुचि के साथ लिखना यह जिज्ञासा पैदा करता ही है. आप जानते हैं कि भारत कितना बड़ा बाज़ार है. बेशक़, भारत में अगर किताब हिट हो जाए यानी ज़्यादा बिक जाए तो बड़ा मुनाफा हासिल किया जा सकता है. नॉन फिक्शन को भारत में बेचने के लिए उसमें भारतीय संदर्भ ज़रूरी हैं. और ये संदर्भ भावनाओं को उकसाने, विवाद पैदा करने वाले या दिलचस्पी बढ़ाने वाले हों, तो फायदा ज़्यादा होना तय है.

तो क्या सिर्फ पब्लिसिटी स्टंट है?

इनकार नहीं किया जा सकता. जिस तरह से पिछले काफी समय से न केवल ओबामा बल्कि उनकी पत्नी मिशेल ओबामा भी सोशल मीडिया का मुस्तैदी से इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस तरह वो सोशल मीडिया सेलिब्रिटी बन रहे हैं, उससे एक एजेंडा तो सामने आता ही है. शोभा डे ने अपने लेख में ओबामा दंपतियों को कारदाशियां दंपति का ‘पॉलिटिकल वर्जन’ कहकर लिखा है कि वो अपनी पर्सनैलिटी के बलबूते अपना बिज़नेस एम्पायर खड़ा करने की कोशिश में हैं.

ओबामा से पहले ​मिशेल भी किताब लिखकर कुछ विवाद खड़े कर चुकी हैं और काफी कमाई कर चुकी हैं. दोनों अपनी किताबों से 6.5 करोड़ डॉलर की बड़ी धनराशि कमा चुके हैं. भारत और एशिया के बाज़ार में किताब ज़्यादा बिक सके, इ​सलिए इतना प्रचार, इतने विवाद और इतनी चर्चा की कवायद हो रही है, यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है.

थोड़ा ही पीछे जाकर याद कीजिए तो आपको ध्यान आएगा कि अमेरिका चुनाव की हलचलों के बीच डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व सहयोगी से लेकर उनके परिवार से जुड़े लोगों तक ने ‘टेल ऑल’ बुक्स के ज़रिये सुर्खियां बटोरीं और ट्रंप की पोलें खोलकर इन किताबों ने भी अच्छी कमाई की. लेकिन इनमें चूंकि भारतीय संदर्भ न के बराबर थे इसलिए इन किताबों की बिक्री भारत में न के बराबर ही रही. कोई भी सियासी किताब भारत में तभी बिक सकती है, जब वो भारतीय मिर्च मसालों से तैयार रेसिपी हो.